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यादें – मेरे जमशेद की

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Jul 31, 2015
  • 1 min read

बात 1978 की है । जुलाई की । सातवीं सिटी मोंटेसरी लखनऊ से पास कर के bvm नैनीताल में आठवीं में गए थे । नई जगह थी । नई व्यवस्था थी । नया सिस्टम था । नए दोस्त थे । VIII- A की क्लास चल रही थी । gym के पास वाले classes में पहाड़ी की तरफ वाला corner रूम था । शायद अंग्रेजी का विषय था । गुरुदेव और बच्चों का  introduction चल रहा था । गुरु जी ने मुझसे पूछा – 


नाम – अरुण मिश्र 

कहां से – लखनऊ 

पिताजी का नाम – श्री रामबोध मिश्र 

क्या करते हैं – बैंक ऑफ़ बरोडा में नौकरी 

क्या हैं – Peon 


कई बच्चे हंसने लगे । जमशेद, जो उस समय अपने जैसा ही अपनी उमर का बच्चा था, पर शायद अपनी उमर से बड़ा था, खड़ा हो गया, और बोला –


There is nothing to laugh. He is honest and brave to say the truth. We all should respect elders and their work. 


… And there was pin drop silence in the class room….


बात आई गई हो गई । अब यह बात किसी को नहीं याद होगी । जमशेद को भी नहीं । पर मुझे याद है । क्योंकि उनका यह आचरण मुझे छू गया था । दिल की गहराइयों में बस गया मेरा जमशेद । 


मैं तुमसे मिलना चाहता था जमशेद । 


I owe you a lot. 


मैं तुम्हारा हुआ, हमेशा के लिए । 

Love you Jamshed.




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