चिर यात्रा पर चले गए
- Arun Mishra

- Sep 16, 2020
- 3 min read
ये दोनों चित्र मेरे बच्चों के नाना नानी के हैं.
पहला चित्र बेटे की नानी का है. तब वह सात साल का था. बात 29 अक्टूबर 2000 की है. हम वाशी नवी मुंबई में सेक्टर 1 में रहते थे C टाइप सुब्बू के फ्लैट में रहते थे. रात 11 बजे थे. फोन की घंटी बजी. खबर मिली मम्मी जी चली गई. वैष्णों देवी के दर्शन कर के अपने बड़े बेटे के साथ लौट रही थी. लखनऊ से सुल्तानपुर के लिए बस चल चुकी थी. जगदीशपुर के bhel वाले अस्पताल के पास पहुँची थी. तबियत खराब हो गई. अस्पताल के डॉ. साहेब को पूछा गया. उन्होंने कहा कि माँ जी चली गई हैं. कंडक्टर ड्राइवर ने समझाया कि कोई कुछ न बोले. चुपचाप बैठे रहें. ड्राइवर गाड़ी चलाता रहा. बेटा माँ को अपने बगल में बिठा कर, उनका सिर अपने कंधे पर रख कर शून्य शांत बैठा रहा. यात्री जगह जगह उतरते रहे. आखिरी स्टॉप पर सब यात्री उतर गए. ड्राइवर ने बस पुनः स्टार्ट की और माँ जी को घर तक लाया, उन्हें छोड़ कर प्रणाम करके चला गया.
दूसरा चित्र बेटे के नाना जी का है. नानी का क्रिया कर्म तेरही श्राद्ध सब उन्होंने ही किया. करीब 20 तक एकल जीवन जिए. यूँ तो परिवार के सभी लोग लगभग हमेशा साथ थे, पर वो तो नही थी, जिन्हें वो प्यार से मोटू कहते थे, जिनके संग हँसी खुशी सुख दुख होता था. मेरी जब भी उनसे बात होती थी तो ठहाकों के साथ होती थी, मैं मुंबई से हँसता था, वो सुल्तानपुर से हँसते थे. अभी हाल का उदाहरण देखिए -
2 तारीख की बातचीत है -
- नमस्ते पापा - प्रणाम भैया (बेटा) - कैसे हैं पापा - बढ़िया हैं, हा हा हा, चाय पी ली है, टीवी देख रहा था, मंदिर बन रहा है, इससे अच्छा जीवन मे कुछ अन्य नही हो सकता, चीन को भी छका रखा है, ससुरा सोच रहा होगा कि किससे पाला पड़ गया है, हा हा हा - आप अपना ध्यान रखिएगा पापा - अरे अब क्या ध्यान रखें, 89 हो गया है, बोनस दिन चल रहे हैं, पर कह रहे हो तो ध्यान रखूंगा, हा हा हा
3 को वे चले गए । हम तुरंत तो नहीं पँहुच पाए पर 6 को सुल्तानपुर पहुंच गए । 16 को तेरही है ।
यादें बहुत सारी हैं. पहली बार सासु जी को मैंने माँ 22 अप्रैल 1992 की सुबह 7 बजे कहा था. मिला कम, पर मैं उनसे जब भी मिला, केवल और केवल ममत्व ही अनुभव किया. वह मुझे स्वयं परोसती थी व पहला कौर अपने हाथ से खिलाती थी. 1997 की बात है, दिवाली का समय था, हल्की ठंडक थी, सुबह के 7 बज रहे थे, मैं बगल वाले ठाकुर साहेब के कमरे के सामने धूप में बैठा था, माँ जी वहाँ आई, बगल में बैठ गई, दुलार करते हुए बोली - बेटा तुम बहुत अच्छे हो, कभी हमसे गुस्सा न होना, किसी से भी न होना, रेणु का हमेशा ध्यान रखना. उनकी आवाज के इतना प्यार था, इतनी भावुकता थी, इतना ममत्व था, कि मेरा गला रुँध गया, बस इतना बोल पाया - 'जी, मम्मी जी'.
ससुर जी को पहली बार पापा जी शायद 1994 में बोला. उससे पहले जब भी, एक दो बार मुलाकात हुई, उन्हें मैं पण्डित जी कहता था. उनका शानदार व्यक्तित्व था. वे कर्मठ थे, अनुभवी थे, व्यवहार कुशल थे, सम्मान व सत्कार करने वाले थे, रामायणी थे. कई बार
उनके बेटों ने कहा कि वो उनके साथ दिल्ली में रहें पर वो न माने. उनकी बेटी ने कहा कि मुंबई आकर उनके पास रहें पर वो न माने. उन्होंने अपने मन मे तय कर लिया था कि वो उसी घर में रहेंगे जहाँ माँ रहती थी व जहाँ से वो इस संसार से विदा हुई. 3 सितंबर 2020 को जब तबियत खराब तो उनकी नातिन उन्हें अस्पताल ले गई, जिन्होंने लखनऊ के अस्पताल ले जाने की सलाह दी.एम्बुलेंस लखनऊ को चल दी, उसी bhel वाले अस्पताल के पास पहुँची थी, तबियत जादा खराब हुई, एम्बुलेंस उसी अस्पताल की तरफ मोड़ दी गई, डॉ. साहेब ने देखा और बोले कि पापा जी चिर यात्रा पर चले गए हैं.











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