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राजन की वो कहानी

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Sep 23, 2020
  • 2 min read

Updated: Sep 30, 2020

रविवार, 4 मई 2014 की बात है. उम्र में मेरे से छोटे, मेरे बेटे समान, जो मेरे बिजनेस लाइन में हैं, जिनका नाम राजन है, अपने भाई भरत, हम उम्र मामा व अन्य दो ऑफिस स्टाफ जागृति व सोनल के साथ मुंबई आए. वो बड़ौदा के रहने वाले हैं. उनका सबसे छोटा भाई घर से नाराज होकर कहीं चला गया था, शायद यह कह कर गया था कि अब मैं तब लौटूँगा जब बहुत पैसा कमा लूँगा, बड़ा आदमी बन जाऊँगा. ऐसी बात हो तो शक की सुई मायानगरी मुंबई की तरफ जाती है. इसलिए उन्होंने सबसे पहले मुंबई में तलाश करना उचित समझा. वे मुंबई आए तो मैने उन्हें अंधेरी स्टेशन पर रिसीव किया.

उन सब को मैं अपने घर लेकर आया. मेरी पत्नी व बच्चे गाँव गए थे. जागृति व सोनल ने खाना बनाया. बाकी सभी भाई को ढूंढ़ने मुंबई के स्टेशन वगैरा देखने चले गए. मुंबई के 3 करोड़ की जनसंख्या में किसी को ढूंढ़ना आसान नही है. यहाँ तो यह भी नही पता था कि वो मुंबई ही आया है या कहीं और चला गया है. दो तीन दिन सब ने ढूंढ़ा. फिर थक गए.


मैंने समझाया कि इस तरह परेशान होने से लाभ नही है. अभी सब वापस घर जाएं. माता पिता को संभालें. समय ही सबसे अच्छा समाधान होता है. समय आने पर सब ठीक हो जाएगा.


वो सब मान गए और चले गए.


कुछ दिनों बाद जब पत्नी व बच्चे वापस आए तो मैंने पत्नी को सब सुनाया. फिर एक सुझाव दिया. सुझाव था कि दिवाली में हम बड़ौदा राजन के यहाँ चलें, 4-5 दिन रहें, उनके माता पिता से बात चीत करें, उनका बेटा कहीं चला गया है, नही मिल रहा, बेचारे बहुत दुखी होंगे, हमारे साथ बात चीत करने से, साथ रहने से, उनका मन हल्का होगा, अन्यथा वो मानसिक रूप से थक जाएंगे, बीमार भी हो सकते हैं. पत्नी सहमत हो गई.


मैंने राजन को फोन किया. मुख्य उद्देश्य नही बताया. केवल इतना कहा कि - राजन हम बड़ौदा आ रहे हैं, कहीं बाहर रुकने की व्यवस्था नही करना, 4-5 दिन तुम्हारे घर पर रहेंगे, सब के साथ रहेंगे, सब के साथ खाएंगे पियेंगे व बातें करेंगे. राजन बहुत खुश हो गया, बोला - आइए सर, मेरा अहो भाग्य, आप सब आइए.


हम गए. 5-6 दिन रुके. सबसे खूब बातें की. इधर उधर घूमें. साथ मे खाना खाया. साथ मे मस्ती की. माहौल बदलने लगा. माता पिता व अन्य अब हँसने लगे. उनका मन अब बोलने लगा था. अब मुसकराने लगे थे.


जब हमने तीसरे दिन कहा कि अब हम जाएंगे तो कुछ कुछ बातें बता कर एक दिन और रोक लिए गए, और अगले दिन पानी पूरी चाट की पार्टी का लालच देकर एक दिन और रोक लिए गए हम भी रुक गए क्योंकि उनका प्रेम सब बातों से बड़ा था.

अंततः जब चलने लगे, तो राजन के माता पिता अति भावुक थे, दिल मे प्रेम था और आँखों मे आँसू थे.


हमें खुशी थी हम अपने अघोषित उद्देश्य में सफल हुए, अब माता पिता व अन्य पहले से बेहतर थे, दुख कम हुआ था, और अब जादा स्वस्थ थे.


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करीब 6 माह बाद, चले गए बेटे का फोन आया. वो भी वापस आ गया. यह बड़ी खुशी थी.

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