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The Teacher

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Sep 14, 2020
  • 2 min read

सुल्तानपुर में एक गाँव है, नाम है कबरी. वहाँ एक माध्यमिक व एक प्राथमिक विद्यालय है. ये चित्र प्राथमिक या प्राइमरी वाले सेक्शन के हैं.


दूसरे चित्र में जो महोदया बैठी हैं उनका नाम ऋचा पाण्डे है. वो प्राइमरी की प्रधानाध्यापिका हैं. उनके बगल में अध्यापिका नीलम व अध्यापिका विजय लक्ष्मी सिंह बैठी हैं. अध्यापिका संजू पांडे किसी अन्य कार्य मे व्यस्त थी, इस लिए चित्र में नही आ पाईं.


Richa जी अध्यापिका 2005 से थी, पर यह विद्यालय बतौर प्रधानाध्यापिका 2012 में जॉइन किया. विद्यालय में यह पद बहुत वर्षो से खाली पड़ा था. कोई वहाँ की नियुक्ति ले नही रहा था. कारण यह था कि विद्यालय गाँव मे बहुत दूर था, गाड़ी जाने का उपयुक्त रास्ता नही था, विद्यालय में बच्चों को बैठने के लिए बेंच तक नही थी, क्लास रूम में पंखे नही थे, दीवारों का कलर उतर गया था, जमाने से पेंट नही हुआ था, लगता था कि कोई खंडहर है.


ऋचा जी ने यह पोस्ट बतौर चैलेंज स्वीकार किया. तब प्राइमरी का बजट न के बराबर होता था, समझिए जीरो बजट होता था. सीमित बजट में ऋचा जी ने साफ सफाई करवाई व दीवारों को कलर करवाया. कमरों में पंखे लगवाए.


धीमे धीमे 2-3 वर्ष बीत गए. एक दिन उन्होंने दूसरी अध्यापिकाओं से बातचीत की. अपनी इच्छा बताई कि स्कूल में बेंच होनी चाहिए.बच्चे जमीन पर बैठते हैं. वो बेंच पर बैठेंगे तो अच्छा लगेगा. सभी ने सहमति जताई. पर समस्या थी कि बजट नही था. 50 हजार का प्रोजेक्ट था, जीरो बजट में कैसे किया जाए


फिर तय हुआ कि वो समाज से सहायता माँगेगी और जरूरत पड़ा तो अपनी सैलरी से पैसा लगाएंगी. पास के गाँव के प्रधान के पास सब गए. अपनी बात बताई. प्रधान जी बहुत खुश हुए. तुरंत 10,000 का दान दे दिए. काम शुरू हो गया. 26 जनवरी को बेंच अपनी अपनी क्लासरूम में लग गई. बाकी का पैसा धीमें धीमे, कुछ सरकारी खर्चो से, कुछ योगदान से, साल भर में दिया गया.


जब मैने आस पास के कुछ अन्य लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि सभी अध्यापक अध्यापिकाएं बहुत अच्छे हैं, कभी कभी अपनी सैलरी से पैसे खर्च कर के बच्चों को कॉपी पेंसिल आदि की मदद करते हैं.


मैंने पूछ ही लिया - मैडम, आप लोग ऐसा क्यों करते हैं ? उनके उत्तर में संजीदगी थी, भावुकता थी, बच्चों के प्रति ममत्व था.

उन्होंने कहा - ये बच्चे अपने ही बच्चे हैं, अपने बच्चों को संभालना पड़ता है, उनको हम साल भर पढ़ाई के लिए डाँटते हैं, गुस्सा करते हैं, तब भी वो हमें प्यार करते हैं, सम्मान देते हैं. उन्हें भी तो प्यार दुलार का अधिकार है, सरकार ने शिक्षा का अधिकार दिया है, विद्यालय के माध्यम से प्रयास भी कर रही है, तो क्या हम लोग प्यार दुलार से देख रेख भी नही कर सकते, आखिर हैं तो हमारे ही बच्चे.


हम अवाक रह गए, निरुत्तर हो गए, हाथ जोड़ कर सम्मान में खड़े हो गए.



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Dr. Arun Mishra

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