दशरथ मामा
- Arun Mishra

- Sep 6, 2020
- 3 min read
जिन्हें आप फोटो में देख रहे हैं उन्हें मैं व मेरी पत्नी दशरथ मामा कहते हैं, नाम है दशरथ सिंह.
बात 1975 की है. दशरथ सिंह जी सुलतानपुर में कचहरी में मुंशी थे. परागदीन की कोठी में बहुत सारे कमरे थे जो कोठी के मालिक जी लोगों को किराए पर दे देते थे. एक कमरे में दशरथ जी रहते थे. एक सज्जन, बलिकरन पांडे जी, जिनका ट्रांसफर सुल्तानपुर हुआ था, बगल वाले कमरे में किराए पर रहते थे . पाण्डे जी की पत्नी को दशरथ जी बहन कहने लगे. इसलिए उनकी बेटी रेणु के वो मामा बन गए.
बहन ने भाई दशरथ से कहा कि भैया, बेटी बड़ी हो गई है, कोई वर ढूंढ़िए. भैया बोले ठीक है. बात 1983 की है, दशरथ जी लखनऊ गए व मिश्रा जी (मेरे पिता जी) से मिले. विवाह की बात की. पिताजी बोले कि बच्चे अभी छोटे हैं. दशरथ जी बोले - ठीक है, पंडित जी, हम समय का इंतजार करेंगे.
9 साल तक दशरथ जी कारण अकारण लखनऊ जाते रहे और मिश्रा जी से मिलते रहे.
बात 1992 की है. एक दिन लड़की के पिताजी व भाई लड़की के विवाह के लिए लड़का देखने इलाहाबाद चल दिए. बात लगभग तय ही थी. पर लड़की व उसकी माँ के मन मे लखनऊ वाला रिश्ता ही बैठा था. कारण साफ था कि भैया दशरथ जी ने लड़के का बहुत गुणगान कर रखा था व मिश्रा परिवार का बहुत अच्छा चित्र दिखा रखा था, जिससे उनका मन वहीं बैठ गया था. जब पिताजी जी व भाई इलाहाबाद चल दिए तो लड़की अपनी माँ से बोली कि माँ मुझे इलाहाबाद नही जाना. माँ समझ गई. दशरथ जी को बुलाया, बोली - भैया, एक बार फिर से लखनऊ जाओ, बात करो, लड़की का वहीं मन है, उसे कहीं और नही जाना, आज लखनऊ वालों से हाँ करवा कर ही आओ, और माँ की आँखों मे आँसू भर आए.
भाई बहन की आँखों के आँसू को देख रो उठे. तुरंत उठे और चल दिए, लखनऊ की ओर.
इधर लड़की के पिताजी इलाहाबाद की ओर जा रहे थे और उधर लड़की के मामा दशरथ जी लखनऊ की ओर.
लड़की के पिताजी की गाड़ी रास्ते मे खराब हो गई. तब के जमाने मे मोबाइल वगैरा नही था. इलाहाबाद वाले मिलने की तय जगह पर बहुत देर इंतजार किए, फिर नाराज होकर वापस चले गए.
इधर लड़की के मामा दशरथ, मिश्रा जी के यहाँ पँहुच गए. बहुत भावुक होकर मिश्रा जी से बोले - पंडित जी, लड़की को बुखार आ गया है, बीमार हो गई है, कह रही है कि लखनऊ वालों के यहाँ विवाह नही होगा तो कहीं अन्य जगह विवाह ही नही करेगी. उसकी माँ भी बीमार हो गई है. पंडित जी, अगर उन्हें कुछ हो गया तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा, बहुत पाप लगेगा.
पंडित जी पंडिताइन से पूछे. पंडिताइन बोली, हमें पाप नही लेना, उन्हें हाँ कह दीजिए. पंडित जी हाँ बोल दिए. दशरथ जी मन ही मन बहुत खुश हुए. प्रणाम किए और खबर सुनाने तुरंत सुल्तानपुर चल दिए.
घर पँहुचे तो देखा कि लड़की के पिताजी बैठे थे, बताया कि गाड़ी खराब हो गई, इसलिए वापस आ गए. बोले - दशरथ सिंह, तुम सुनाओ. दशरथ जी कुछ न बोल पाए, बोल ही नही निकल पाए, भावुक हो गए, आँखों मे आँसू भर गए.
लड़की की माँ चिंतित हो गई, बोली कि क्या हुआ भैया, कुछ तो बोलो.
दशरथ जी बोले, खुशी की बात है, मैं बोल नही पा रहा हूँ, मिश्राजी हाँ बोल दिए हैं. विवाह तय हो गया है.
सब खुश हो गए. अप्रैल 1992 में रेणु व अरुण का विवाह हो गया.
आज मुझे वही दशरथ जी मिल गए. मैंने कहा, दशरथ मामा इधर आइए, उनकी फोटो खींची, फिर पूछा कि क्या आपको 1992 वाली बात याद है. वो हँसने लगे, और विस्तार से सारी कहानी सुनाए. आज 2020 का समय है, 28 साल बीत गए, लड़की की माँ तो बहुत पहले चली गई थी, कुछ दिन पूर्व पिताजी भी चले गए. उनकी यादों में वे खो गए, कहानी सुनाने लगे, कहानी सुनाते सुनाते वो भावुक हो गए, उनकी आँखे नम हो गई.











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