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वो मेला होता था जिंदगी का

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Sep 1, 2015
  • 2 min read

हमारे नाना कहते थे कि गंगा स्नान करने से सब पाप धुल जाते थे । बात पुरानी है । 1970-80 । गौरीगंज से माणिकपुर पॅसेंजर ट्रेन से नाना नानी गंगा स्नान करने जाते थे । एक दो बार मुझे भी साथ ले गए थे । ट्रेन खचाखच भरी होती थी । प्लेटफॉर्म जमीन के लेवल पर होता था । जवान लोग बूढ़ों को ऊपर की तरफ उठा कर धक्का देकर ट्रेन में चढ़ाते थे । कोयले वाला इंजन सीटी बजाता था । ट्रेन सरकने लगती थी । नाना जी लोगों के लिए तो साइकिल भी अविष्कार था । ट्रेन तो उन्हें बुलेट लगती थी । कहते थे – भैया, गाड़ी बहुत तेज भागत है ।


ट्रेन से माणिकपुर पंहुचते थे । फिर 5 km पैदल चलते थे । नाना जी कहते थे – थोड़ी दूर है । बस 5 कदम है । बड़ा मेला होता था । सब के पंडा जी तय थे । हम लोग अपने इलाके के पंडा जी के पास जा कर ठहरते थे । वहां गावं देश से आए और लोग भी मिलते थे । रिश्ते नाते भी मिल जाते थे । सुबह सुबह गंगा में डुबकी लगाई जाती थी । गंगा माँ की पूजा होती थी । मेले से औरतें अपने सृंगार का सामान खरीदती थी । यह उनके लिए प्रसाद होता था । शृद्धा देखिए – नानी कहती थी कि गंगा माई का सिंदूर है । इसे लगाने से नाना जादा जिएं गे । नानी से भी जादा । हम भले ही ना माने ये सब पर वो सब मानते थे । मेले में गुड़ की जलेबी मिलती थी । हम सब खाते थे । स्नेह बढ़ता था । प्यार बढ़ता था । सब लोग गावं वापस आकर फिर से काम में लग जाते थे ।

वो भी क्या दिन थे भाई । गंगा माँ कि दी हुई नई जिंदगी मिल जाती थी सबको ।

वो मेला होता था जिंदगी का !


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