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शादी का लंहगा

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Sep 27, 2015
  • 4 min read

मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि उसे जयपुर जाना है।


“अचानक जयपुर क्यों?”

“सलोनी की शादी तय हो गई है, इसलिए।”

“तो, क्या सलोनी की शादी जयपुर में है?”

“नहीं बाबा, शादी में पहनने के लिए वो वहां से लंहगा खरीदना चाहती है।”

“शादी तो अगले महीने है और लंहगा तो दिल्ली में भी मिलता ही होगा, उसके लिए जयपुर जाने की क्या ज़रूरत?”


“ओह! तुम मर्द लोग कुछ समझते ही नहीं। उसे कोई ख़ास डिजाइनर लंहगा पसंद है। उसने बहुत पहले से तय किया हुआ है। वो लंहगा करीब तीन लाख रुपये का है। उसकी शादी है, उसके अरमान हैं, वो मुझे साथ ले जाकर उस लहंगे को दिखाना चाहती है, मुझसे पसंद करना चाहती है। इसमें क्या बड़ी बात है?”


“तीन लाख का लंहगा?”


पत्नी मेरी फटी आंखें देख कर हंसने लगी। “तुम इतना हैरान क्यों हो रहे हो? तीन लाख का लंहगा तो कुछ भी नहीं है।


आजकल तो शादी के लहंगे बहुत महंगे होते हैं, दस लाख का लंहगा भी लड़कियां खरीदती हैं। वो तो मैं तुम्हें मिल गई, जिसने हज़ार रुपए की साड़ी में खुशी-खुशी तुमसे शादी कर ली, इसलिए तुम्हें लहंगे का दाम ही नहीं पता।”


पत्नी ठीक बोल रही थी। मुझे सचमुच लहंगे का दाम नहीं पता। वो यह भी सच बोल रही थी कि उसकी शादी हज़ार रुपए वाली साड़ी में हो गई। सचमुच मैंने तो कभी सोचा ही नहीं था कि शादी में तीन लाख का लंहगा भी कोई खरीदता होगा।


खैर, आपको बता दूं कि सलोनी मेरी परिचित की बेटी है। सलोनी मेरी पत्नी को बहुत मानती है इसीलिए वो अपना लंहगा पसंद कराने के लिए उसे जयपुर ले जाना चाहती है। कुछ दिन पहले ही सलोनी की तारीख तय हुई है और अगले महीने शादी है।


मैंने पत्नी से पूछा कि ये शादी का जो लंहगा होता है, उसे लड़कियां दुबारा कब पहनती हैं?


पत्नी थोड़ी देर सोचती रही। फिर उसने कहा कि वैसे ध्यान से सोचो तो सचमुच दुबारा वो उसे कभी नहीं पहनतीं।

“फिर इतने महंगे लहंगे का क्या तुक?”


“ओह! हर लड़की के कुछ अरमान होते हैं। शादी का लंहगा एक भावनात्मक मुद्दा है, तुम इसमें कहानी मत ढूंढो।”

***


मेरे पिताजी अपने दफ्तर से नई डायरी लाए थे। मैंने पिताजी से कहा कि मुझे भी ऐसी डायरी चाहिए। पिताजी ने मेरी ओर देखा और पूछा कि तुम डायरी का क्या करोगे?


बात सही थी, मैंने यह सोचा ही नहीं था कि मैं डायरी का क्या करूंगा। तब मैं स्कूल में पढ़ता था और सचमुच मेरे लिए उस डायरी की क्या उपोयगिता हो सकती थी? लेकिन वो डायरी इतनी खूबसूरत लग रही थी कि मेरे मन में बार-बार आ रहा था कि अगर मुझे यह डायरी मिल जाए, तो मैं इसमें ये लिखूंगा, वो लिखूंगा। इस डायरी का कवर इतना सुंदर है, मैं इसे संभाल कर रखूंगा। मैंने पिताजी से कहा कि आप अगर मुझे यह डायरी दे देंगे, तो मैं रोज कुछ न कुछ इसमें लिखूंगा।


पिताजी थोड़ी देर तक मेरी ओर देखते रहे। फिर उन्होंने वो डायरी मुझे दे दी।


डायरी मुझे मिल गई, मानो सारा संसार मुझे मिल गया। मैंने उस डायरी के कवर के नीचे अपना नाम लिखा-संजय सिन्हा।

डायरी पाकर मैं सोचने लगा कि इसमें पहले दिन क्या लिखूं। तारीख थी 1 जनवरी। मैं बहुत सोचा, पर मुझे बार-बार लगता कि इतनी सुंदर डायरी है, इसमें कोई फालतू चीज लिख कर इसे बर्बाद नहीं करुंगा। पर उस दिन मैं ऐसा कुछ लिख ही नहीं पाया और 1 जनवरी का वो पहला पन्ना खाली रह गया।


मुझे वो डायरी इतनी पसंद थी कि मैं उसे अपने साथ लेकर बिस्तर पर सोता। तकिया के नीचे वो डायरी रखता, सोचता कि कल इसमें कुछ लिखूंगा।


मेरा यकीन कीजिए, वो कल नहीं आया।


वो डायरी खराब न हो जाए, इसलिए मैंने उसमें कुछ नहीं लिखा और साल बीत गया।


साल बीत जाने के बाद भी मैं काफी दिनों तक उस डायरी को संभाले रहा, पर एक दिन मुझे लगने लगा कि अब तो यह डायरी पुरानी हो गई है, इसका मैं क्या करूं। एक ऐसा वक्त आया कि मैंने उस डायरी को बिना एक पन्ना लिखे, कबाड़ी वाले को दे दिया।

***


आपको पहले भी बता चुका हूं कि मेरी मां के पास कई बनारसी साड़ियां थीं।


मां अक्सर उन साड़ियों को बक्से से निकालती, उन्हें देखती, तह लगाती और कहती कि ये साड़ी संजू की शादी में पहनूंगी, ये फलां त्योहार पर और ये फलां फंक्शन पर। मां सारी ज़िंदगी उन साड़ियों को संभालती रही। और एकदिन मां बीमार हो गई और उनमें से एक भी साड़ी वो नहीं पहन पाई। सारी की सारी नई साड़ियां पड़ी रह गईं। मुझे याद है कि मैंने पहले भी लिखा है कि मां के जाने के बाद वो सारी साड़ियां रिश्तेदारों के हाथ लग गईं और उन साड़ियों को काट कर किसी ने अपने लिए ब्लाउज बनवा लिया, किसी ने उनके पर्दे सिलवा लिए।

***


मैंने पत्नी से कहा कि तुम जयपुर चली जाओ। मुझे तुम्हारे वहां जाने पर कोई आपत्ति नहीं। पर तुम सलोनी को समझाओ कि कुल दो घंटे के लिए तीन लाख का लंहगा खरीदने का कोई औचित्य नहीं है। मुझे तो यह भी लगता है कि शादी-ब्याह के मौके पर किसी का ध्यान किसी के कपड़े पर जाता भी नहीं है। दुल्हन लाल साड़ी पहने है, या लाल लंहगा इस पर भी किसी का ध्यान जाता होगा क्या? शादी ब्याह में तो हर किसी की नज़र अपने कपड़ों पर होती है। और अगर उसे लंहगा ही लेना हो, तो थोड़ा सस्ता सा ले ले। उस तीन लाख रुपए के लहंगे को न वो दुबारा पहनेगी, न फेंकेगी। वो लंहगा शादी के बाद उसके बक्से में कैद हो जाएगा। फिर वो उसे कुछ दिनों तक बक्से से निकाल कर कभी-कभी देखेगी कि यह उसकी शादी का लंहगा है। तीन लाख रुपए का लंहगा है और उसे दुबारा बक्से में रख देगी।

***


हम सभी ऐसी चीजों की चाहत रखते हैं, जिसकी दरअसल हमें उतनी ज़रूरत नहीं होती।


चीज चाहे जितनी अच्छी हो अगर उसकी ज़रूरत नहीं, उसका पूरा इस्तेमाल नहीं, तो वो चीज एकदिन लाल डायरी बन जाती है, बनारसी साड़ी बन जाती है।


‪#‎Rishtey‬ Sanjay Sinha


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