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समाज प्रेम को स्वीकार करे

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Dec 16, 2015
  • 3 min read

खबरें समाज, परिवार व रिश्तों पर चिंतन करने को मजबूर करतीं हैं। खबरें परिवर्तन करने को चीखती चिल्लाती है। खबरें कहतीं हैं कि अब हठ त्याग दो और समय के अनुसार कुछ तो परिवर्तन करो अपने रिश्तों को बनाने व निभाने में। कल की एक खबर के मुताबिक बारात घर आने से पहले ही युवती प्रेमी संग भाग गई। प्रेमिका युवती पहले भी अपने प्रेमी के साथ भाग चुकी थी परंतु परिजनों ने उसे ढूंढ निकाला था।


ढूंढने के बाद उसे नानी के घर भेज दिया कि बस अब नानी के घर से वे अपने मनपसंद लडके से अपनी लडकी की शादी करा देगें फिर वो एक इज्जतदार जिंदगी जियेगी। माता-पिता अपनी पसंद के लडके के साथ शादी कराना चाहते थे पर सवाल ये बनता है कि क्या उन माता-पिता सहित परिजनों ने उस लडके को ये बताया होगा कि बेटे जिस बेटी से हम तुम्हारी शादी कर रहे हैं वो पहले से किसी के बेटे से प्रेम करती है और इतनी बेइंतहा मुहब्बत थी कि उसे अपना घर पिंजरा महसूस होने लगा और हम परिजन दुश्मन महसूस होने लगे इसलिये वो अपना ही घर छोडकर प्रेमी संग फरार हो गई या यूं कहें कि अपने मायने में उसने अपने प्रेम को पाने का प्रयास किया था और प्रेम भरी जिंदगी जीना चाहती थी।


लेकिन इससे हम परिजनों की इज्जत को बट्टा लग रहा था इसलिये हमने उसे धर पकड कर नानी के घर पिंजरे में बंद कर दिया है और उस प्रेमिका शेरनी से तुम्हारा ब्याह रच रहे हैं ? इतना सबकुछ बताने के बाद भला कोई लडका किसी ऐसी लडकी से शादी करने को क्यूं सोचेगा ? लडकी तो अपने प्रेमी के साथ जीना चाहती थी परंतु क्या सोचकर परिजन उसकी शादी किसी गैर मर्द से कर रहे थे जबकि ये जानते हुए कि उनकी बेटी किसी और से मुहब्बत करती है।


मानाकि परिजनों के मन से उस लडकी की शादी उनके मन के लडके से हो जाती तो क्या वो लडका लडकी के मन का राजा बन पाता ? उस लडके से शादी कर के उनकी बेटी खुश रहती ? उस लडके से शादी करके परिजनों की आखिर कितनी इज्जत बढ जाती ? जिंदगी किसे जीनी है लडकी और लडके को एक साथ, शादी किसलिए होती है खुशहाली के लिए लेकिन जब वही शादी जोर जबरदस्ती की होती है तब क्या दो जिंदगानी खुशहाल हो पातीं हैं ? आखिर परिजन प्रेम को इज्जत से क्यूं जोडते है, प्रेम स्वाभाविक है ये हर युग में होता है और आज तक प्रेम मर नहीं सका भले प्रेमी प्रेमिका मर गये लेकिन प्रेम आज भी जीवित है।


परिजन ये बात क्यूं नहीं अहसास कर सकते कि उनकी बेटी जिससे प्रेम करती है वही उसकी जिंदगी है और समाज प्रेम का दुश्मन क्यूं बना हुआ है जबकि इसी दरम्या से वे भी गुजरते हैं लेकिन समझौते की जिंदगी जीते हैं लोग और फिर चैन सिस्टम की तरह अपने साथ समझौते की जिंदगी खोखली इज्जत के नाम पर जीने को मजबूर करते हैं और एक कडी अपने साथ जोडते चले जाते हैं।


सदियों से प्रेमी प्रेमिका बिछड रहे हैं, वियोग में मर रहे हैं लेकिन प्रेम नहीं मरा और समाज समझ नहीं सका इन्हें प्रेम में भी इज्जत घटने जैसी बात लगती है। प्रेम नैसर्गिक है वो कभी भी किसी को भी किसी से भी हो सकता है लेकिन इज्जत, मान मर्यादा, जाति धर्म के बीच मर रहा है प्रेम। धर्म के ठेकेदार हैं और जाति के ठेकेदार हैं, अमीरी गरीबी के पैरोकार हैं, इन्हें प्रेम से नफरत है लेकिन दहेज से आज तक इन्हें नफरत नहीं हो सकी है। ये दहेज डंके की चोट पर लेते हैं लेकिन अगर प्रेम की शादियां होने लगेगीं और परिजन सहयोग करने लगेगें तो कम से कम दहेज रूपी दानव का अंत हो जायेगा और दो प्रेमी परिजनों के साथ प्रेम से जिंदगी व्यतीत करने लगेगें।


क्या ऐसा संभव है ? कि प्रेम को स्वीकार किया जाने लगे जाति से परे, धर्म से परे, समाज प्रेम को स्वीकार करे लेकिन ऐसा संभव नही होगा।


अगर ऐसा संभव नही होगा तो इज्जत पर बट्टा ना लगना भी असंभव है। प्रेम ऐसे ही जीता रहेगा और झूठी इज्जत पर बट्टा लगता रहेगा। एक बार अगर वो आजाद हो गई थी तो परिजनों को उसे पिंजरे में कैद करना ही नहीं चाहिये था। वो फुर्र हो गई अपने प्रेमी के साथ बस इतना ही कि उसका प्रेमी उसे ताउम्र खुश रखे।


इस समाज के बंधन, रीति रिवाज परंपरा हमें मजबूर करते हैं समझौते की जिंदगी जीने के लिए सभी प्रेम चाहते हैं, खुशियां चाहते हैं परंतु प्रेम के दुश्मन भी तो हम हीं हैं इसलिये दुखी भी हम ही रहेगें वरना प्रेम को जांचों, समझो, अहसास करो, सम्मान करो और सूझबूझ से शादी करो वरना शादी के बाद भी जिंदगी बरबाद होती है आपके बेटे और बेटियों की।


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