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प्रेम !
- Arun Mishra

- Dec 21, 2016
- 1 min read
प्रेम ! तुम्हे विस्तृत आकाश और धरा के मध्य वरण किया है मेरे हृदय ने
प्रेम ! उषा काल में पवित्र सूर्य किरणों के नर्म स्पर्श में अनुभूत किया है मेरी देह ने
प्रेम ! खिलते प्रसून बारिश की बूंदों और…. इन्द्रधनुष के रंगों में तुम्हें देखा है मेरी आँखों ने
प्रेम ! पत्तियों की सरसराहट नदी की कल-कल और मन्द हवा के मधुर स्वरों में सुना है मैंने प्रेम राग.
प्रेम! अब मैं तुम्हे गाना चाहती हूं ओमकार स्वर में लिखना चाहती हूं प्रत्येक हृदय पर.
प्रेम ! मैं तुम्हे बाँटना चाहती हूं संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में. श्वासों के अंतिम स्पन्दन तक.











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