पलायन
- Arun Mishra

- Mar 12, 2020
- 3 min read
रजनी का फोन आया । अरुण, तुम भी यहीं आ जाओ । वही रजनी जो मेरे साथ 1988 में काम करती थी । जिसकी बातचीत अतुल से जादा होती थी । वही लंबे सीधे बालों वाला स्मार्ट तेलगू इंजीनियर अतुल जो मेरे साथ काम करता था और मेरे साथ ऑफिस क्वार्टर में रहता था । कन्नड़ मुम्बईया रजनी ने एक दिन बताया कि-
– अरुण, मुझे अतुल से प्यार हो गया है । – और उसे ? – उसे भी । पर वो डरता है । कहता है कि शादी न करेगा । – क्यों ? – उसके माता पिता सहमत नहीं हैं । – और तुम्हारे माता पिता ? – सहमत तो वो भी नहीं है पर मैं तैयार हूँ । लड़की होकर मैं तैयार हूँ, पर वो लड़का होकर डर रहा है । अरुण, तुम कुछ करो न ? – मैं क्या कर सकता हूं रजनी ?
– मुझे नहीं पता अरुण । कुछ भी करो । तुम मेरे भाई हो । ब्राह्मण पंडित भाई । तुम्हे सब मालूम है क्या और कैसे करना है । और वो भावुक हो गई ।
मैं शांत हो गया । कमरे में पहुंचा । अतुल से बात की । उसने भी कबूला कि सारी बात सही है । उसने कहा कि वो तैयार है, पर माँ बाप को दुःख पहुंचा कर नहीं । समाधान न निकलते देख मैंने उसे ब्रेनवाश किया । आगे की कहानी फिल्मी है । बिलकुल फिल्मी । कोर्ट मैरिज, परिवारों का रूठना, मनाना, कोम्प्रोमाईज़ करना ….
दिन बीतते गए । आज के युग में आगे बढ़ने के लिए नौकरियां कपड़ों की तरह बदली जाती हैं । हम कहीं और चले गए, वो दोनों कहीं और चले गए । एक दिन पता चला कि वो दोनों देश छोड़ अमेरिका चले गए । पलायन कर गए ।
आज उसी रजनी का फोन आया था । अगस्त 1997 की बात है । अमेरिका बुला रही थी ।
– कैसे हो अरुण ? – ठीक हूँ रजनी । अतुल कैसा है ? बेटा कैसा है ? – सब ठीक हैं अरुण । अतुल वैसा ही है । इंजीनियर कहीं का ! तर्क पे तर्क करता है ! बेटा बड़ा हो गया है । कह रहा है आप को भी अमेरिका बुला लें । – नहीं रजनी । मैं सूखी रोटी में सुखी हूँ । पलायन न कर पाउंगा ।
– कब तक लड़ोगे आरक्षण से, अरुण । बची 50% सीटों में भी अघोषित आरक्षण है । रिश्तेदारी का आरक्षण, लेन देन का आरक्षण । भावुक मत बनो । यहां अवसर है, यहां आ जाओ । और ये कहते कहते उसकी आवाज नम हो गई ।
– क्या हुआ रजनी ? सब ठीक तो है ? – ठीक है अरुण । याद आ रही है । मां की याद आ रही है । परिवार की याद आ रही है । दोस्तों की याद आ रही है । मिट्टी की याद आ रही है, अरुण ।
– रजनी, तुम दोनों वापस आ जाओ । – नहीं अरुण, अब मुश्किल दिख रहा है । तुम्ही तो कहते थे कि पंछी जहां जाते हैं, वहीं घोसला बना लेते हैं । जाल बुनने लगते हैं । और पता ही नहीं चलता, एक दिन वो स्वयं उसी में फंस जाते हैं । कुछ वैसा ही हो गया है । अब जादा न बोल पाउंगी । Bye अरुण । – अपना ख्याल रखना रजनी । Take care, Bye.
मैं चुपचाप बैठ गया । सोच रहा था कि कब तक आरक्षण प्रतिभाओं को खाता रहेगा । कब तक प्रतिभाएं पलायन करती रहेंगी । वही अतुल आज हिंदुस्तान में होता तो देश के लिए काम करता । आज उसकी बनाई हुई चीजों पर Made in India लिखा होता ।









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