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माँ को सबसे जादा प्यार करें

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Feb 11, 2015
  • 2 min read

माँ, तुझे प्रणाम !!


जब मैं अपनी माँ को फोन करता हूँ तो न Hello कहता हूँ न Hi, न गुड मोर्निंग, न नमस्ते, बस केवल माँ कहता हूँ, और उसी में सब हो जाता है, हेलो भी, hi भी, नमस्ते भी, प्रणाम भी ! मेरे भाई, पत्नी, बच्चे … सब प्यार से चिढ़ाते हैं कि गाय के बछड़े कि तरह माँ…, माँ… करता हूँ. अब उन्हें कौन समझाए कि मैं बछड़ा ही हूँ.. इसमें लगाव है. इसमे अपनत्व है. इसमें प्यार है.

कोई हमें लाख समझाए कि माँ ऐसी है, माँ वैसी है, माँ ने ये किया, माँ ने वो किया, … पर हमें समझ में आता नहीं, या यूँ कहिए कि मैं समझता ही नहीं, सही बात तो यही है कि मैं समझना चाहता ही नहीं. उलटे समझा देता हूँ कि ‘छोड़ो, होए गा, जाने दो, सब में कुछ अच्छाइयां होती हैं, कुछ कमियां होती हैं, इसलिए जाने दो, माँ जैसी भी है अच्छी है. और यही सही है.’




मैं बहुत छोटा था, १ साल से छोटा था, बहुत बीमार हो गया. ऊपर से बड़ी चेचक हो गई. तब बड़ी चेचक ‘बड़ी माता’ जानी जाती थी. १९६६, गावं का घर, खेत खलिहान वाला घर, गाय भैस वाला घर, शहर से दूर, दवाखाने से बहुत दूर, सब कुछ भगवान जी, देवी जी के भरोसे चलता था. किसी ने बता दिया कि दुर्गन ‘दुर्गा जी का मंदिर’ नंगे पैर ले कर जाओ सब ठीक हो जाएगा. भोली माँ, मुझे कंधे पर सुला कर, सुबह सुबह ४ बजे, नंगे पैर, ३ कोस से जादा, पैदल जाती थी, और मंदिर में दर्शन करा कर वैसे ही वापस आती थी. अकेली. हफ़्तों ऐसा किया. महीनों ऐसा किया. बाकी सब समय है.


माँ के बेटे ने बहुत कुछ देखा, बिरला विद्या मंदिर नैनीताल देखा, BITS पिलानी देखा, दिल्ली देखी, मुंबई देखी, …. बहुत कुछ देखा, पर माँ तुझ सा दूसरा ना देखा. उस समय नाना जी गावं के अमीर थे और आस पास के १० गावों में उनकी आवाज बोलती थी. बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, जो भी माँ कहती, वह सामने खड़ा होता. पर माँ कुछ नहीं बोली, पैदल नंगे पावं महीनों गई मंदिर, कोसों दूर, अकेले. वो माँ अपने बच्चे के लिए पागल हो गई. आज बच्चा क्यों न हो. मैं भी हूँ. माँ मैं भी तेरे लिए पागल हूँ.


हर माँ अपने बच्चे को ऐसा ही प्यार देती है. बड़े होकर, थोड़ा पढ़ लिख कर, हम उसकी बातों को गलत और अपनी या दूसरों की बातों को सही समझें, इसमें कोई समझदारी नहीं है.


अगर समझदारी दिखानी है तो माँ कैसी भी हो, उसके भोलेपन को सम्मान दीजिए, उसके त्याग को सम्मान दीजिए, उसके प्यार को सम्मान दीजिए.


माँ, तुझे प्रणाम !!

अरुण मिश्र 

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