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कहाँ गये वो रिश्ते

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Sep 26, 2015
  • 4 min read

हमारे घर से बाज़ार की दूरी कुल सौ मीटर होगी। मां शाम को सब्जी लेने जाती, तो मुहल्ले की चार महिलाएं साथ होतीं। घर में कभी किसी की जरा तबीयत खराब होती, तो दूर-दूर से रिश्तेदार घर आ जाते, हालचाल पूछने, देखने।

आज मैं फिर अस्पताल की कहानी सुनाऊंगा। यह तो मैं कई बार बता चुका हूं कि इन दिनों मेरा चक्कर अस्पताल के खूब लग रहे हैं। मेरे एक परिचित की तबीयत खराब है और मैं उन्हें देखने कई बार अस्पताल जाता हूं। कल भी मैं अस्पताल गया था।

कल अस्पताल के डे केयर में मेरी निगाह एक महिला पर पड़ी जो कैंसर की मरीज़ थी और वो वहां कीमोथेरेपी के लिए आई थी। मैंने उसे बहुत गौर से देखा, वो करीब घंटा भर से बुकिंग वाले बाबू की कुर्सी के पास अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। कीमोथेरेपी में करीब छह-सात घंटे लगते हैं, ऐसे में सभी मरीज़ों को डे केयर में बाकायदा भर्ती किया जाता है, फिर कीमो के डोज दिए जाते हैं।


मैं अपने परिचित के पास बैठा था, कुछ देर में मैंने देखा कि वो महिला आकर सामने वाले बेड पर लेट गई है। आम तौर पर कीमो डोज के बाद मरीज को कमजोरी का अहसास होता है। ऐसे में हर मरीज़ के साथ एक न एक अंटेंडेंट वहां ज़रूर होता है। होना चाहिए।


पर मेरे सामने वाले बेड पर वो महिला अकेले ही आई थी।


नहीं, अकेले नहीं थी, उसके साथ उसकी नौकरानी थी। मैं बहुत आश्चर्य में था। कोई कैंसर के इलाज के लिए आया है, कीमो के डोज उसे लेने हैं और उसे सिर्फ नौकरानी का साथ मिला है?


मैंने दिल्ली के तमाम मॉल्स में बड़े घर की कई महिलाओं को नौकरानियों के साथ देखा है। आम तौर पर ये नौकरानियां उनके बच्चों को संभालती हैं, उनके साथ खेलती हैं, उनका ध्यान रखती हैं। ख़ास कर जब ये महिलाएं शॉपिंग कर रही होती हैं, तो ये उनके बच्चों को बहला रही होती है।


मॉल्स में नौकरानियों का साथ ही मुझे खटकता था। मुझे उन महिलाओं को देख कर हमेशा लगता था कि क्या इनके घर में इनकी भाभी, ननद, बहन, मां, सास कोई नहीं होंगी, जो उनके बच्चों का ध्यान रख सकें। क्या ये बच्चे इन नौकरानियों की गोद में ही पलते हुए जवान हो जाएंगे।


मेरी सोच अभी उस दिशा में अटकनी शुरू ही हुई थी कि मेरी निगाह अस्पताल में उस महिला की अटेंडेंट नौकरानी पर पड़ गई।

मैंने सोचा कि उस महिला से मैं मौका पाकर बात करूंगा। लेकिन तब तक उसके कीमो का डोज़ शुरू हो गया था।

इस बीच अपने परिचित से मिल कर मैं अस्पताल से बाहर निकल पड़ा। मैं जैसे ही बाहर निकला, मुझे वो नौकरानी बाहर दिख गई।


मैंने उससे पूछा कि तुम उस महिला को अकेली छोड़ कर यहां बाहर चली आई हो?


नौकरानी ने कहा कि सर अब छह-सात घंटे तो यहीं रहना है। और यह तो हर हफ्ते होता है। अभी थोड़ी देर में मैं फिर उनके पास चली जाऊंगी।


मैंने उससे सहज जिज्ञासा में पूछ लिया कि क्या इनके घर में कोई नहीं? क्या ये अकेली हैं?


उसने जो बताया उसे सुन कर मैं अवाक रह गया। उसने कहा कि इनके पति को बिजनेस से फुर्सत नहीं और बच्चों को मटरगश्ती से। पूरे घर को पता है कि इस दिन ये कीमो वाला इलाज़ होगा, तो घर के लोगों को अस्पताल आना चाहिए था। पर पति को बीवी से ज्यादा दफ्तर से प्यार है। बच्चों के लिए मां की अहमियत इतनी ही है कि उनसे ये पैदा हो चुके हैं। इसके अलावा सबकुछ कुछ ज़ीरो है, साहब, ज़ीरो।


ओह!


एक नौकरानी ऐसा बोल सकती है, मैं सोच नहीं सकता था।


मुझे लगने लगा कि मैंने गलत बात पूछ ली थी। मैं चुप था। पर नौकरानी मेरी ओर देख कर धीरे-धीरे से बोले जा रही थी साहब, अब लोगों के रिश्तेदार नहीं होते। अब लोगों के पास पैसे होते हैं और उस पैसे के बूते वो हमारे रिश्ते खरीद लेते हैं। ***

उसकी बात पूरी होने से पहले ही मैं वहां से निकल आया। सारे रास्ते सोचता रहा कि क्या सचमुच हमारे रिश्ते कहीं खो गए हैं?

माना कि नौकरानी हमारी ज़रूरतें पूरी कर सकती है, वो हमारे शरीर का सहारा भी बन सकती है, लेकिन क्या वो हमारे मन का सहारा भी बन सकती है? क्या उसकी आंखों में भी वही स्नेह उमड़ सकता है? उसके दिल से भी वही दुआ निकल सकती है, जो हमें अपने रिश्तों में मिलती है?


बहुत देर सोचता रहा।


सोचता रहा कि कहीं हम दौड़ती-भागती ज़िंदगी में तन्हा तो नहीं हो गए हैं?


बहुत पहले सुना था कि राजस्थान के रजवाड़ों में किसी की मौत के बाद अगर परिवार में कोई रोने वाला नहीं होता, तो किराए पर रोने के लिए महिलाएं बुलाई जाती हैं। उन्हें रुदाली कहते थे।


अपनी आंखों से ये तो देखा ही है कि आजकल दिल्ली-मुंबई के मॉल्स में महिलाएं शॉपिंग के लिए भी अपनी नौकरानियों को साथ लाती हैं। आदमी एकदम अकेला तो नहीं रह सकता, इसलिए किराए पर आदमी लेकर साथ घूमता है। पर क्या नौकरानी आप पर वही प्यार लुटा सकती है? क्या वह आपकी हमदर्द हो सकती है? क्या हम नौकरानी से अपनी खुशियों और अपने गम को साझा कर सकते हैं?


नहीं।


किराए का आदमी तो किराए का ही होगा।


मुझे लगता है कि आजकल लोग ज्यादा बीमार इसलिए भी पड़ रहे हैं, क्योंकि अब न तो लोगों के पास रिश्ते हैं, न रिश्तों से निकलने वाली दुआएं हैं। अब सबकुछ किराए पर चलता है।


काश किराए पर दुआएं भी मिलतीं! काश किराए पर प्यार भी मिलता! काश किराए पर कोई हमदर्द मिलता! ***

मां कभी-कभी बातचीत में देहाती मुहावरों का सहारा लिया करती थी। मुझे एक मुहावरा याद है, “सोना बह जाए, कोयला पर छापा।”


सचमुच हमारी ज़िंदगी से रिश्तों का सोना बह रहा है और हम कोयला पकड़ कर बैठे हैं।

#‎Rishtey‬ Sanjay Sinha


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