इस बैग की एक कहानी है
- Arun Mishra

- Aug 1, 2018
- 1 min read
कहानी जून 2018 की है.
लड़के के मम्मी पापा व लड़की की मम्मी पापा का बातचीत के लिए मिलना तय हुआ, 22 जून को.
लड़के की माँ ने 18 जून को बैग खरीदा. दो हल्दीराम के रसगुल्ले के can खरीदे. डी मार्ट से चॉकलेट खरीदी, एक पैकेट डार्क ब्राउन और दूसरी किट कैट गिफ्ट पैक. सब बैग में रख लिया, और 19 जून को चल दी, ट्रेन से, बहुत दूर, लड़के के लिए लड़की से मिलने.
कुछ कारण बन गया और मुलाकात टल गई.
दो दिन बाद, लड़के की माँ लड़के के पापा के साथ लखनऊ चल दी, अपने चचेरे भाइयों से मिलने. पापा ने समझाया कि बैग लेते चलो, भाई के बच्चों को दे देना. माँ बोली – नहीं, ये मेरी बहू के नाम से है, दूसरे को नही दूंगी. पापा ने समझाया, अंदर रखा सामान बच्चों में बाँट दो, प्यार बाँटना चाहिए, जब मिलना तब नया सामान खरीद लेना. माँ इस बात पर मान गई, बोली – पर बैग नही दूंगी. वो बहुत जादा प्यार से लिया है, किसी के लिए, उसे ही दूंगी.
लड़के के मम्मी पापा लखनऊ में तीन जगह गए, प्यार से एक can एक जगह, दूसरा can दूसरी जगह, एक चॉकलेट का पैक तीसरी जगह दे दिया. फिर मम्मी पापा, लखनऊ से सुल्तानपुर गए, मम्मी के पापा के यहां, वहां बच्चों को दूसरा चॉकलेट का पैक दे दिया.
बैग का क्या हुआ ?
जिसके नाम लिया था, रख लिया सहेज कर, उस बैग को, प्यार से, मीठी यादों के लिए.









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