हम अपने ही मायाजाल में फंस गए
- Arun Mishra

- Jul 31, 2018
- 2 min read
बात 1988 की है. बिरजू (मेरे स्कूल व कॉलेज वाले दोस्त Brijesh Singh) ने कहा – अरुण, मुंबई आ जाओ. कोई रास्ता निकल आएगा.
पिताजी से ₹ 2000 लेकर, निकल पड़ा, मायानगरी की तरफ, मित्र से मिलने, किसी अनदेखी मंजिल की तरफ. और फिर चलता रहा, जीवन की उस अनदेखी मंजिल की तरफ, अविराम, अनवरत.
नौकरी मिली, काम मिला, दूसरी नौकरी मिली, दूसरा काम मिला, …., कभी जादा कभी कम कभी खुशी कभी गम, चलती रही गाड़ी, कभी अगाड़ी कभी पिछाड़ी, ….
इस दौरान जिंदगी बुनती रही एक एक जाल, बिन बताए, चुपचाप.
1992 में शादी हो गई, 1993 में संसार में बेटा आ गया, 1997 में, येन केन प्रकारेण, पहला 1R (एक कमरे का फ्लैट) ले लिया, 1998 में ईश्वर ने बेटी दी, 1998 में स्वतः का एजुकेशन बिजनेस शुरू किया, 1999 में 1RK ले लिया, 2000 में किराए के ऑफिस से अपने ऑफिस में चले गए, 2004 में 1RK से 1BHK हो गया, 2011 में एक दूकान हो गई, 2015 में इगतपुरी में एक 2BHK vacation flat हो गया, 2016 में बेटा इंजीनियर बन गया, बेटी इंटीरियर डिज़ाइनर बन गई, 2018 में 1BHK से 2 BHK हो गया.
ये जो वर्ष लिखे हैं, इन्हें आप mile stone समझ सकते हैं, मील के पत्थर समझ सकते हैं, वो मील के पत्थर जो बताते हैं आप कितनी यात्रा तय कर चुके हैं, और इस यात्रा में अभी तक आपने क्या खोया है और क्या पाया है. पाया वाली कहानी तो मैंने लिख दी, खोया वाली कहानी नही लिखी, न लिखूंगा, न लिख पाऊँगा, क्योंकि जो खोया है वो अनमोल है. माँ से दूर रहा, माँ गाँव में रह गई, मैं शहर में भटक गया, शहर की माया में भटक गया, ममता को खो कर मायानगरी की माया में भटका रहा. अपने इर्द गिर्द एक जाल बुनता गया, गृहस्थी का जाल, बेटा बेटी घर परिवार का जाल, फ्लैट दूकान ऑफिस प्लॉट प्रॉपर्टी का जाल. गाँव छूट गया, पिताजी चले गए, माँ अकेली हो गई, उन्हें पिताजी के बनाए घर में रहना है, बच्चे कैरियर में फंसे हैं, वो अपने जीवन की दौड़ में दौड़ रहे हैं, और हम मायाजाल में फंसे हैं, अपने ही मायाजाल में, चाह कर भी नही निकल सकते, इस मायाजाल से. चाह कर भी नही लौट सकते, उस छांव में.
अरुण 31 जुलाई 2018









Comments