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धन नहीं, मन से मिलती हैं खुशियां

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Jun 24, 2015
  • 2 min read

खुशियां पाने के लिये सभी अमीर होना चाहते हैं। सभी को खुशियों का राज कागज के नोटों के रहस्य में नजर आता है। इस दुनियां में सभी ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहते हैं जिससे वह खुश रह सकें लेकिन सबसे बडा सवाल यह है कि क्या वास्तव में धन से ही खुशियां मिलती हैं, अधिक धनवान होना ही खुशियों का कारण है? यह बात बहुत से उन लोगों को सत्य प्रतीत हो सकती है जिनके पास धन नही है लेकिन जिनके पास अधिक से अधिक धन है कभी उनसे भी बात करिये कि क्या वास्तव में वे खुश हैं या खुश दिखने की कोशिश करते हैं।


अमीर बहुतायत आपको अस्पताल में नजर आयेगें क्यूंकि पहले वे धन कमाने के लिये कमरतोड मेहनत करते हैं जिसमें वो अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना भूल जाते हैं और धीरे धीरे वह धन से मजबूत होते हैं लेकिन शरीर से कमजोर पड जाते हैं तब उनका कमाया हुआ धन अस्पतालों में पहुचने लगता है। इसलिये पहली बात यह है कि स्वस्थ शरीर खुशियो का पहला रहस्य है और संयमित जीवन से स्वस्थ शरीर पाया जा सकता है।

जीवन में धन एक साधन है जो कुछ लक्ष्य प्राप्त करने में सहायक होता है और लाइफ स्टाइल स्टैंडर्ड बनाये रखने में मददगार होता है। जीवनयापन के लिये, खुशी जीवन के लिये बहुत अधिक धन की आवश्यकता नहीं होती है जबकि जीवन जीने के लिये प्रेम की आवश्यकता अधिक एहसास होती है वह प्रेम पति पत्नी का भी हो सकता है, प्रेमी प्रेयसी का हो सकता है, आपसी मित्रों का हो सकता है, रिश्तेदारो का हो सकता है और आसपास पडोस का हो सकता है तब जीवन सहज वा सरल हो जाता है क्यूंकि जब आप परेशानियों से घिरे होते हैं अवसादग्रस्त होते हैं तब सिर्फ कोई धन नहीं आपको साहस प्रदान कर सकता है बल्कि भावनात्मक सहयोग और किसी का कंधे पर भावनात्मक स्पर्श ही हमें बल प्रदान करता है और किसी की मीठी बोली हमारा मन चंगा कर सकती है, किसी का हमारी तरफ प्रेम से देखना हमारे होठों पर मुस्कान बिखेर सकता है और संकट के दिनों एक मित्र की सच्ची मित्रता ही आपको नया जीवन प्रदान कर सकती है।

इसलिये धनवान होना आवश्यक है परंतु धनवान बनने के पीछे अपने रिश्ते नाते, प्रेम, मित्र गंवा देना समझदारी नहीं होगी क्यूंकि आप ध्यान देगें तब आपको बहुत से धनवान खुशियों को खोजते हुए दिख जायेगें और वह स्वयं को खुश रखने के लिये तरह तरह के प्रयास करते हैं, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, कुछ कूल डूड बार पहुच जाते हैं और तमाम बडे व्यापारी विदेशों में जाकर खुशियां खोजने का काम करते हैं वहां वे घूमते हैं, ट्रस्ट में चैरिटी करते हैं इसलिये अगर आप खुश होना चाहते हैं तब नोटों से धनी बनने से ज्यादा आपको मानवता का धनी बनना चाहिये समाज में सबको अपनेपन का एहसास कराइये और अपनत्व के साथ प्रेम बांटते फिरिये फिर आपके धन के निहितार्थ भी सिद्ध हो जायेगें।

वरना क्या होगा बहुत धनवान बनने से, मैं धनवान सिर्फ इसलिये बनना चाहता हूं क्यंकि मेरे जीवन के कुछ लक्ष्य ऐसे हैं जिनको बिना अधिक धन के नहीं पाया जा सकता है जैसे राक्षसों का वध बिना शस्त्र के नहीं किया जा सकता है इसलिये धन सिर्फ शस्त्र हो सकता है अस्त्र नहीं।

‘सौरभ द्विवेदी’ – बात मेरे मन की !



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