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बेटा, मैं तो चित्रगुप्त हूं

  • Writer: Arun Mishra
    Arun Mishra
  • Sep 30, 2015
  • 4 min read

कभी-कभी कोई मज़ाक या कोई चुटकुला सुन कर दिल रो पड़ता है। हालांकि लोग चुटकुला इसलिए सुनते और सुनाते हैं कि आदमी हंसे। पर कई दफा उसमें इतना तंज होता है कि आप हंसने की जगह स्तब्ध रह जाते हैं। आप हंसने की जगह रो पड़ते हैं।

मेरे मोबाइल पर किसी ने एक चुटकुला भेजा और लिखा कि आप इसे पढ़ कर अपनी हंसी रोक नहीं सकते।

मैं जानता हूं कि आप सोच रहे होंगे कि संजय सिन्हा, सीधे-सीधे चुटकुला ही सुना दो, इतनी लंबी भूमिका मत लिखो। ऐसा ही होता है। आदमी मूल बात पर फटाफट आना चाहता है। खैर, मेरा दुर्भाग्य देखिए कि उस चुटकुले को पढ़ कर मैं जरा भी नहीं हंसा। मेरे पास हंसने के लिए कुछ था ही नहीं। ***

परसों मेरे पास खबर आई थी कि मेरे एक परिचित को सांस लेने में जरा तकलीफ हो रही थी तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेरे परिचित की उम्र करीब 80 साल रही होगी, पर यह भी सच है कि वो परसों जब अस्पताल गए थे, तो स्ट्रेचर पर नहीं गए थे। वो खुद चल कर अस्पताल के इमरजंसी वार्ड तर पहुंचे थे। भरेपूरे परिवार वाले उस घर के मेरे परिचित ने अस्पताल में डॉक्टर से अपनी तकलीफ खुद बयां की थी और इमरजंसी में भर्ती कर लिए गए थे।

मेरे परिचित की पत्नी, बेटे, बहू, बेटी, दामाद, नाती, पोते सभी अस्पताल में मौजूद थे। सभी अस्पताल के वेटिंग एरिया में बैठ कर इंतज़ार कर रहे थे कि डॉक्टर उन्हें इमरजंसी से कब ट्रांसफर कर वार्ड में भेजेगा। इमरजंसी में उनके पास सिर्फ एक अटेंडेंट को रहने की इजाजत थी।

खैर, मेरे परिचित का पोता उनके पास बैठा था।

अचानक मेरे परिचित के पोते की निगाह उन मशीनों पर गई जिनसे ब्लडप्रेशर आदि की जांच अपने आप होती रहती है। उसने देखा कि उसके दादा जी का रक्तचाप बहुत तेजी से नीचे गिर रहा है। पर उस इमरजंसी वार्ड में उस वक्त वहां न तो वहां डॉक्टर मौजूद था, न नर्स। सारी नर्सें अपनी टेबल पर बैठी गप कर रहीं थीं। उनके पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं था कि वो उस इमरजंसी में भर्ती किसी मरीज की बिगड़ती तबीयत पर खुद नज़र रख पातीं। मेरे परिचत का पोता भाग कर नर्स के पास गया और उसने बताया कि उसे लग रहा है कि उसके दादा जी की तबीयत खराब हो रही है। नर्स ने उसकी बात को भी बहुत गंभीरता से नहीं लिया और धीरे-धीरे चलते हुए उसके साथ मरीज के पास पहुंची। वहां पहुंच कर उसने देखा कि वाकई उनका ब्लड प्रेशर बहुत नीचे गिर चुका था, दिल की धड़कन बंद हो चुकी थी, हाथ पांव ठंडे पड़ रहे थे।

यह देख कर वो ज़रा घबराई। उसने फटाफट डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर आए, उन्होंने कोई मशीन मंगाई और उन्हें कृत्रिम तरीके से सांस देने की कोशिश की गई, दिल के धड़कन को लौटाने वाली मशीन से झटका दिया। पर कुछ नहीं हुआ। आखिर में डॉक्टर ने उन्हें पहले वेंटिलेटर पर डाला, फिर मरीज के अटेंडेंट से कहा कि आप बाकी रिश्तेदारों को बता दीजिए कि इनकी तबीयत ज्यादा सीरियस है और अब हमें इनकी डायलिसिस करनी पड़ेगी।

मरीज का अटेंडेंट भाग कर अस्पताल के वेटिंग एरिया में पहुंचा और उसने सारी बात बताई।

तब तक डॉक्टर भी वहां पहुंचा और उसने बताया कि मामला सीरियस है। अब ये करना होगा, वो करना होगा। पर उसने ये नहीं बताया कि जिस वक्त मरीज का ब्लड प्रेशर नीचे गिर रहा था, वहां कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। नर्सें अपने मोबाइल फोन और अपने साथियों से गप करने में व्यस्त थीं। किसी की नज़र मरीज की बिगड़ती स्थिति पर नहीं थी।

खैर, उस रात इलाज का खूब ड्रामा हुआ। पर मेरे परिचित का पोता जिस तरह पूरी घटना सुना रहा था, उससे मैं समझ चुका था कि उनकी मृत्यु हो चुकी है और अब अस्पताल सिर्फ खानापूर्ति कर रहा है और कुछ बिल बढ़ाने का जुगाड़ चल रहा है। मैं चुप रहा।

वही हुआ। अगली सुबह अस्पताल ने घोषणा कर दी कि उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा और शरीर के बहुत से अंगों ने काम करना बंद कर दिया और उनकी मृत्यु हो गई।

अस्पातल के रिकॉर्ड में यही लिखा भी गया।

पर यह कहीं नहीं लिखा गया कि जब मरीज़ को इमरजंसी वार्ड में दिल का दौरा पड़ा तो उस वक्त वहां कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। नर्स की निगाह जीवन रक्षक मशीनों पर नहीं थी। मेरे परिचित मर गए और जिसे भी उनकी मौत के बारे में पता चला, सबने कहा कि ओह! 80 साल के थे। बेचारे बहुत अच्छे और नेकदिल थे। भरा पूरा परिवार है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

किसी के दिमाग में ये खयाल नहीं आया कि 80 साल के उस बुजुर्ग की मौत शायद नहीं हुई होती अगर समय पर उन्हें देख लिया जाता। 80 साल होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अब उन्हें मर ही जाना चाहिए। पर हम स्वभाव से ऐसी चीजों को सह जाने के अभ्यस्त हैं। हम किस्मत, भगवान की मर्जी कहते हुए सभी के अपराधों को माफ कर देते हैं। हम मान लेते हैं कि मृत्यु की वजह ईश्वर की ही मर्जी है, उसमें कहीं मानवीय भूल नहीं। पर मेरा दिल नहीं मान रहा। मैं जानता हूं कि मेरे वो परिचित अभी कई और साल खुशी से जीवित रह सकते थे। वो जीवट थे, खुशमिजाज थे। इस संसार में जो आया है, उसे जाना ही है। पर कल वो सिर्फ डाक्टरों की लापरवाही से चले गए।

*** अब आप उस चुटकुले को भी सुन लीजिए, जिसे सुन कर आप यकीनन हंसेंगे नहीं। और हंसना चाहिए भी नहीं।

एक बार एक आदमी बीमार होकर अस्पताल पहुंचा। वहां उसका आपरेशन हुआ। जब वो होश में आया तो उसने सामने खड़े व्यक्ति से पूछा, “डॉक्टर साहब, अब मैं पूरी तरह ठीक हो गया हूं न? मेरी सारी बीमारी ठीक हो गई है न? सामने खड़े व्यक्ति ने उससे कहा, “बेटा, मैं तो चित्रगुप्त हूं। तुम्हारा डॉक्टर तो नीचे धरती पर ही रह गया।”

‪#‎Rishtey‬ Sanjay Sinha

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